मेहरानगढ़ किले का इतिहास | मेहरानगढ़ किला जोधपुर

मेहरानगढ़ किला जोधपुर:

Mehrangarh Fort Jodhpur Carvings
मेहरानगढ़ का किला, राव जोधा द्वारा 1460 में जोधपुर, राजस्थान में बनवाया गया था। यह भारत के सबसे बड़े किलों में से एक है। यह शहर के तल से 410 फीट की ऊंचाई पर बनाया गया है। किले के चारों ओर मोटी दीवारें हैं।

किले का क्षेत्रफल लगभग 5 किलो मीटर है। दीवारें 36 मीटर ऊंची और 21 मीटर चौड़ी हैं।

मेहरानगढ़ किले तक कैसे पहुंचा जाए

जोधपुर दिल्ली से लगभग 575 KM दूर है। आप ट्रेन, कार और बस से जा सकते हैं। वैकल्पिक रूप से, आप MakeMyTrip के साथ रियायती मूल्य पर फ्लाइट टिकट बुक करके, हवाई मार्ग से जोधपुर पहुँच सकते हैं। सड़क मार्ग से, यदि आप उदयपुर से जाते हैं, तो जोधपुर लगभग साढ़े चार घंटे की यात्रा है, और जयपुर से लगभग छह घंटे की यात्रा है।

जोधपुर पहुंचने के लिए, आप अपनी फ्लाइट MMT पर सस्ते दामों में बुक कर सकते हैं इसके लिए आपको CashFry पर MakeMyTrip Domestic Flight Coupons यूज़ करने पड़ेंगे।

मेहरानगढ़ किले का इतिहास

मेहरानगढ़ का किला पक्की चटानो के ऊपर बना हुआ है। इन चट्टानों को Malani Igneous Suit Contact कहा जाता है, जो कि एक लाख साल पहले ज्वालामुखियों से बने पहाड़ों की एक श्रृंखला है।

राव जोधा, राठौड़ रणमल के पुत्र थे। रणमल के 24 बेटे थे। जोधा 15 वें राठौड़ शासक थे। राव जोधा मंडोर के किले में रहा करते थे। यह किला 1000 साल पुराना था और बहुत ही जर्जर स्थिति में था। जोधा अपनी राजधानी को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करना चाहते थे, और इस प्रकार उन्होंने जोधपुर शहर का निर्माण किया।

जोधपुर की स्थापना, राव जोधा ने 1459 में की थी। जोधपुर का पहले का नाम ‘मारवाड़’ था। इसे ब्लू सिटी भी कहा जाता है क्योंकि वहाँ कई घरों को नीले रंग में रंगा गया है। यह माना जाता है कि नीला रंग मच्छरों को दूर करता है और गर्मी को अवशोषित नहीं करके घरों को ठंडा रखता है। उन दिनों केवल ब्राह्मणों को अपने घरों को नीला करने की अनुमति थी।

Mehrangarh Fort History Blue Houses

राव जोधा एक सुरक्षित जगह पर एक अच्छा किला बनाना चाहते थे। मंडोर के दक्षिण में पहाड़ थे। इस चट्टान का नाम भाकुर चिड़िया था। कुछ लोग इसे ‘भोर चिड़िया’ कहते हैं। चिड़िया मूल रूप से गौरैया होता है। उन पहाड़ों के एक हिस्से पर एक संत चिड़िया नाथ जी का कब्जा था। राव जोधा और श्री करणी माता ने अपने आश्रम को दूसरी जगह स्थानांतरित करने के लिए चिड़िया नाथ जी से अनुरोध किया। शुरू में, चिड़िया नाथ जी स्थानांतरित होने के लिए तैयार नहीं थे। बाद में उन्हें शिफ्ट करने के लिए एक विनम्र अनुरोध के साथ मजबूर किया गया क्योंकि राज्य को एक नए किले की सख्त आवश्यकता थी।

अंत में, चिड़िया नाथ जी स्थानांतरित हो गए लेकिन उन्होंने राव जोधा को शाप दिया कि उनके किले में पानी की कमी हमेशां रहे।

किले के निर्माण के बारे में एक और नकारात्मक तथ्य है। उन दिनों, यह शुभ माना जाता था कि यदि आप एक जिन्दा व्यक्ति को नींव के नीचे दबा देते हैं, तो यह एक सफल निर्माण होगा। इसके लिए राजा राम मेघवाल तैयार हुए। राव जोधा ने राजा राम को आश्वासन दिया कि उनके परिवार का भविष्य में ध्यान रखा जाएगा। यह एक सच्चाई है कि राजा राम मेघवाल का वंशज अभी भी मेहरानगढ़ किले में राज बाग में रहता है, जो किले का एक हिस्सा है।

श्री करणी माता ने किले मेहरानगढ़ की नींव रखी। मेहरानगढ़ नाम ‘मिहिर’ शब्द से रखा गया था। मिहिर एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘सूर्य’। इस लिए जोधपुर को ‘सन सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है।

बीकानेर और जोधपुर के किले अभी भी राठौर परिवार के पास हैं। जोधपुर के लोगों का मानना ​​है की ऐसा इस लिए भी हो सकता है, क्योंकि श्री कर्णी माता ने किले की नींव रखी थी।

शहर से किले तक जाने वाली घुमावदार सड़कें हैं।

यदि आप फाटकों और दीवारों को गौर से देखें तो आप को हमलावर दुश्मनों द्वारा फेंके गए गोला-बारूद के निशाँ आज भी नजर आ सकते हैं।

मेहरानगढ़ किले का इतिहास:

विरासत का कुछ योगदान महाराजा जसवंत सिंह (1629-1678) को भी जाता है। वह गजसिंह का पुत्र था।

उनके पिता गज सिंह बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उन्होंने ‘सिद्धान्त बोध’, ‘आनंद विलास’ और ‘भाव भूषण’ लिखा है।

शाहजहाँ ने 1638 में गज सिंह की मृत्यु पर उनकी इच्छानुसार जोधपुर सहित मारवाड़ का कुछ इलाका महाराजा जसवंत सिंह को सौंप दिया। जसवंत सिंह 1656 से 1666 तक असम प्रदेश का सूबेदार था, जब साम्राज्य का अधिकांश भाग शाहजहाँ (1592-1666) के अधीन था। शाहजहाँ ने 1654 में जसवंत सिंह को महाराजा की उपाधि दी।

1658 में, धरमतपुर में महाराजा जसवंत सिंह और औरंगज़ेब (1618 -1707) के बीच लड़ाई हुई। औरंगजेब ने मुराद, अपने छोटे भाई, को लड़ाई में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। जसवंत सिंह ने इसके लिए इंतजार किया और दोनों सेनाओं को अपने खिलाफ एक साथ लड़ने की अनुमति दी।

इस बीच, शाहजहाँ ने अपने सेनापति कासिम खान को जसवंत सिंह की मदद करने के लिए भेजा लेकिन औरंगजेब ने इस अवधि के दौरान जनरल कासिम खान को अपना बना लिया। इस तरह औरंगजेब और मुराद ने धोखे से जसवंत सिंह को हरा दिया।

बाद में अजीत सिंह ने (1679 -1724), जो जसवंत सिंह के बेटे थे, 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद किले पर अधिकार कर लिया।

उसके बाद, किले पर मारवाड़ के महाराजा मान सिंह (1783-1843) ने कब्जा कर लिया था। वह महाराज शेर सिंह के दत्तक पुत्र और वारिस थे। महाराजा शेर सिंह विजय सिंह के पुत्र थे। विजय सिंह ने 1791 में मान सिंह को सिंहासन का वारिस नियुक्त किया।

मान सिंह के बाद, तख्त सिंह (1819-1873) जोधपुर के महाराजा थे (1843-1873) के दौरान।

जसवंत सिंह II (1838-1895) 1873 से 1895 तक जोधपुर के महाराजा थे।

आगे चलकर, महाराजा सरदार सिंह (1895-1911), सुमेर सिंह (1911-1918), उम्मेद सिंह (1918-1947) हनवंत सिंह (1947-1952), गज सिंह राठौर (1952-आज तक) थे।

विकिपीडिया पर शासकों की पूरी सूची देखें

मेहरानगढ़ किले में बने हुए महल:

किले के अंदर कई महल हैं। मोती महल, फूल महल, शीश महल नाम के महल हैं। दूसरे हैं सिलेह ख़ाना और दौलत ख़ान।

उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण महाराजा उम्मेद सिंह ने करवाया था। निर्माण 1943 में पूरा हुआ था।

मेहरानगढ़ किले के दरवाजे:

किले में प्रवेश करने के लिए सात दरवाजे हैं।

1806 में, जयपुर और बीकानेर की संयुक्त सेनाओं ने मारवाड़ पर हमला किया। महाराजा मान सिंह ने दोनों सेनाओं को हराया। उस जीत की याद में, उन्होंने मेहरानगढ़ किले में ‘जय पोल’ नाम का दरवाजा बनवाया।

फतेह पोल का निर्माण महाराजा अजीत सिंह (1679-1724) ने मुगलों की जीत के उपलक्ष्य में करवाया था।

अन्य पोल हैं डेढ़ कामग्रा पोल (लखना पोल), लोहा पोल, सूरज पोल, भैरों पोल ​​(भेरू पोल), मार्टी पोल (अमृत पोल)।

किले में गोपाल पोल और ताओती पोल के बारे में उल्लेख है, लेकिन ये दतवाजे गायब हैं और उन्हें खोजा जाना चाहिए।

सती रानियों के हाथ के छापे:

लोहा पोल के बाईं ओर रानियों के हाथों के पांच छापे हैं, और 31 छापे दासियों के हाथों के हैं, जो 1724 में अजित सिंह की अंतिम संस्कार की चिता पर स्थापित हुए थे।

किले के बाईं ओर एक छोटा शेड है जो किरत सिंह सोडा की याद में बनवाया गया है। वह मेहरानगढ़ का बहुत बहादुर सैनिक था। उसने किले की सुरक्षा में अपनी जान दी।

मेहरानगढ़ फोर्ट पैलेस संग्रहालय:

Mehrangarh Fort History Grand Palanquin

मेहरानगढ़ किले का संग्रहालय, राजस्थान के प्रमुख संग्राहलयों में से एक है। पालकी, हाथी होवडा का एक बड़ा संग्रह है। इसके अलावा, शाही पालने, लघुचित्र, संगीत वाद्ययंत्र, वेशभूषा और फर्नीचर भी हैं। संग्रहालय में आप किलकिला तोप भी देख सकते हैं।

जसवंत ठाडा की समाधि:

Mehrangarh Fort History Jaswant Singh Thada Mausoleum

यह किले के साथ ही बनी हुई एक सफेद इमारत है। इसका निर्माण महाराजा सरदार सिंह ने 1899 में, महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की याद में करवाया था।

Flying Fox:

Mehrangarh Fort History Flying Fox

झीलों और उद्यानों के विभिन्न मंत्रमुग्ध करने वाले स्थलों को देखने के लिए फ्लाइंग फॉक्स (जिप लाइनिंग) का प्रावधान है। विभिन्न स्थानों को देखने के लिए कई जिप लाइनिंग्स हैं।

You can visit Amer Fort Jaipur, which is also among the most popular forts of India.

मेहरानगढ़ किले का इतिहास | मेहरानगढ़ किला जोधपुर
4 (80%) 1 vote[s]

1 thought on “मेहरानगढ़ किले का इतिहास | मेहरानगढ़ किला जोधपुर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *